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Thursday, March 29, 2012

0342

हारा जाता था तुझसे पर जबसे तूने प्यार को कहा खेल |
ना जाने क्यूँ तबसे ही जीतने की आदत सी हो गयी है ||

Thursday, February 16, 2012

0332

पता नही तेरी मौन स्वीकृति को क्यूँ मैं हाँ समझ बैठा |
पगली तू तो ख्वाब ही थी कोई मैं ही सच समझ बैठा ll
बस दो-चार कदम ही तो चली थी तू हाथों को पकड़ के |
इतने को ही बस मैं ज़िंदगी भर का साथ समझ बैठा ll

Wednesday, February 15, 2012

0331

शबाब को शबाब की हद तक चाहता हूँ l
तू पत्थर ही सही पर तुझे खुदा मानता हूँ ll
कितना भी कर तू मुझे पहचानने से इनकार l
अफ़सोस इस शहर में बस तुझे ही जानता हूँ ll